"ज़िंदगी लंबी नहीं, दिलचस्प होनी चाहिए" — इस कहावत को अपने जीवन में यथार्थ बना देने वाले विरले व्यक्तियों में से एक थे मोहम्मद आरीफ साहब। 1912 में जागीर पदमपुर में जन्मे मोहम्मद आरीफ, शेख हसन अली के चौथे पुत्र थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक निजी मौलवी की देखरेख में हुई। ये मौलवी साहब सैयद बुरहानुद्दीन थे, जो पटना से आकर पदमपुर ज़मींदार के यहाँ ठहरे और बच्चों को शिक्षित किया करते थे। मौलवी साहब के अधीन शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, आरीफ साहब का विवाह अनीसा खातून से हुआ। दुर्भाग्यवश, कुछ ही वर्षों में उनका देहांत हो गया। इसके पश्चात उन्होंने दूसरी शादी गांगी से की, जिनसे उन्हें छह संतानों का सुख प्राप्त हुआ—तीन पुत्र और तीन पुत्रियाँ। जीवन के मध्य काल में उन्होंने अपना अधिकतर समय ज़मींदारी के कार्यों में अपने बड़े भाई फज़लुर रहमान की सहायता में लगाया। साथ ही, उन्होंने एक पंजीकृत होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में भी काम किया। उस समय क्षेत्र अंधविश्वास, झाड़-फूंक और टोने-टोटकों से ग्रस्त था। आरीफ साहब ने इन कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई और होम्योपैथिक चिकित्सा को जनमानस में स्थापित ...