Posts

Padampur Foundation - In Loving memory of Abdul Khalique Sb

Image
अपने पिता मरहूम अब्दुल ख़ालिक़ साहब की स्मृति को समर्पित पदमपुर फ़ाउंडेशन पदमपुर के इतिहास और धरोहर को सहेजने,समाज की सेवा करने का एक छोटा-सा प्रयास है। फ़ाउंडेशन का प्रतीक चिह्न (लोगो) भी इसके नाम से ही प्रेरित है — ‘पदमपुर’, जहाँ पदम का अर्थ है फूल और पुर का अर्थ है जगह। यह मेरे पिता के पदमपुर से प्रेम को एक स्नेहभरी श्रद्धांजलि है। 

विरासत और वजूद: अब्दुल ख़ालिक़ साहब का सफ़र , 1983 से 2023

Image
1983 में अब्दुल ख़ालिक़ साहब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम.फिल. मुकम्मल करके अपने ख्वाब और इरादे लेकर किशनगंज लौटे। उन्होंने इंसान कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया, इस उम्मीद के साथ कि यह जल्द ही एक बड़ी यूनिवर्सिटी का रूप ले लेगा। लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि जिस तालीमी ख्वाब को वह लेकर आए थे, वह कॉलेज की क़ियादत के अजेंडे में नहीं था।  अब्दुल ख़ालिक़ साहब ने इस मायूसी को अपने सफ़र पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने आगे बढ़कर आर.के. शाहा विमेंस कॉलेज के बानी मेंबर के तौर पर ज़िम्मेदारी संभाली और सियासत (Political Science) के उस्ताद बने। ज़मींदारी, खेती-बाड़ी और ज़मीन से जुड़े मसाइल उनकी तालीम या तजुर्बे का हिस्सा नहीं थे — कैसे होते? बचपन से ही वह तालीम के सफ़र में घर से दूर रहे, और चार साल की उम्र में उनके वालिद का इंतक़ाल हो गया था। 29 अप्रैल 1985 को उन्होंने नूर-ए-निगार, पुत्री मासूद ज़फ़र से निकाह किया। किशनगंज में उन्होंने लाइन मोहल्ले में किराए के मकान में रहना शुरू किया। मगर दिल के किसी कोने में अपनी जड़ों की खींच बाकी रही। लाइन मस्जिद, पदमपुर कॉलोनी के आबाई क़त्अे में उन...

Final Journey of Prof. Abdul Khalique Sb.

Image
He took his last breath on 5th March 2024 at his home in Padampur Colony, beside Line Masjid. The Namaz-e-Janaza was held the next day, 6th March, at Line Masjid, Kishanganj. He was laid to rest at the Kabristan in Kishanganj, where his grave can be identified by a tombstone. A Shok Sabha was also organised by the Mahila College administration, where he had served as a teacher until his retirement.

आबाओ-अज्दाद : अता उल्लाह ख़ान से रिदा फ़ैज़ तक

Image
हमारा ख़ानदान अपनी जड़ें पहली नस्ल से जोड़ता है, जिसकी शुरुआत अता उल्लाह ख़ान (यहाँ "ख़ान" एक इज़्ज़त-अफ़ज़ाई का लक़ब था) से होती है, जिनका जन्म तक़रीबन 1820 में हुआ और इंतेक़ाल क़रीब 1890 में हुआ। दूसरी नस्ल में उनके बेटे शेख़ सुब्हान अली (1850–1920) आए। तीसरी नस्ल की नुमाइंदगी शेख़ हसन अली (1880–1945) ने की। चौथी नस्ल में मोहम्मद आरिफ़ (1912–1961) हुए, जिनकी बीवी अनीसा ख़ातून (1928–2012) थीं। पाँचवीं नस्ल में अब्दुल ख़ालिक़ (1957–2024) हुए। अब्दुल ख़ालिक़ और उनकी बीवी नूर-ए-निगार से छठी नस्ल में मोहम्मद फ़ैज़  ,  मोहम्मद शादान  और मोहम्मद शाहज़ेब  पैदा हुए। सातवीं नस्ल इस वक़्त रिदा फ़ैज़ (दुख़्तर-ए-मोहम्मद फ़ैज़ और रुख़संदा फ़ख़रा) की सूरत में मौजूद है।

मरहूम हाजी मोहम्मद आरिफ़ साहब से जुड़ी दस्तावेज़ी झलक

Image
हाजी मोहम्मद आरिफ़ साहब: 1952–1958 के ख़त और दस्तावेज़ सन् 1952 से 1958 के बीच हाजी मोहम्मद आरिफ़ साहब से जुड़ी कई चिट्ठियाँ और दस्तावेज़ आज भी मौजूद हैं, जो उनके व्यक्तित्व और जीवन की झलक दिखाते हैं। इन ख़तों में धार्मिक और सामाजिक पत्राचार से लेकर कानूनी नोटिस तक शामिल हैं। एक ओर मदरसों की बैठकों और इस्लामी तालीम की मजबूती पर लिखे गए पत्र उनकी धार्मिक सरगर्मियों को दर्शाते हैं, तो दूसरी ओर अदालत और प्रशासनिक नोटिस उनके स्थानीय मामलों में सक्रिय भूमिका को बयान करते हैं। इन्हीं दस्तावेज़ों में एक अहम रसीद Manton & Co. Ltd., Calcutta की भी है, जिसमें करीब ₹900 के ऑर्डर का ज़िक्र है। Manton & Co. असल में ब्रिटिश दौर की मशहूर arms & ammunition कंपनी थी, जो मूल रूप से लंदन की Manton & Sons का भारतीय शाखा (Indian branch) थी। यह कंपनी 19वीं सदी से ही राजघरानों, अंग्रेज़ अधिकारियों और बड़े ज़मींदारों को शिकार के लिए बंदूकें, राइफलें और गोलाबारूद सप्लाई करती थी। इस रसीद से साफ़ झलकता है कि हाजी मोहम्मद आरिफ़ साहब का उस दौर के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक दायरे से गहरा नाता था...

मरहूम हाजी मोहम्मद आरिफ़ साहब ( 1912 - 1961)

Image
"ज़िंदगी लंबी नहीं, दिलचस्प होनी चाहिए" — इस कहावत को अपने जीवन में यथार्थ बना देने वाले विरले व्यक्तियों में से एक थे मोहम्मद आरीफ साहब। 1912 में जागीर पदमपुर में जन्मे मोहम्मद आरीफ, शेख हसन अली के चौथे पुत्र थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक निजी मौलवी की देखरेख में हुई। ये मौलवी साहब सैयद बुरहानुद्दीन थे, जो पटना से आकर पदमपुर ज़मींदार के यहाँ ठहरे और बच्चों को शिक्षित किया करते थे। मौलवी साहब के अधीन शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, आरीफ साहब का विवाह अनीसा खातून से हुआ। दुर्भाग्यवश, कुछ ही वर्षों में उनका देहांत हो गया। इसके पश्चात उन्होंने दूसरी शादी गांगी से की, जिनसे उन्हें छह संतानों का सुख प्राप्त हुआ—तीन पुत्र और तीन पुत्रियाँ। जीवन के मध्य काल में उन्होंने अपना अधिकतर समय ज़मींदारी के कार्यों में अपने बड़े भाई फज़लुर रहमान की सहायता में लगाया। साथ ही, उन्होंने एक पंजीकृत होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में भी काम किया। उस समय क्षेत्र अंधविश्वास, झाड़-फूंक और टोने-टोटकों से ग्रस्त था। आरीफ साहब ने इन कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई और होम्योपैथिक चिकित्सा को जनमानस में स्थापित ...

प्रोफेसर अब्दुल ख़ालिक साहब की जीवन यात्रा (1957–2024)

Image
आग़ाज़-ए-ज़िंदगी (1957–1964) अब्दुल ख़ालिक़ साहब की  पैदाइश 1957 में ज़िला किशनगंज के पुरसुकून और सादगी भरे गाँव पदमपुर में हुआ। बचपन मोहब्बत और अपनाईश से लबरेज़ था, मगर 1961 में महज़ चार साल की उम्र में उन्होंने अपने वालिद मोहम्मद आरिफ़ साहब को खो दिया। यह एक ऐसी कमी थी जो कभी पूरी न हो सकी, लेकिन इस वाक़िया ने उनके अंदर सब्र और ख़ुदारी का जज़्बा पैदा कर दिया। कम उम्र में ही उन्होंने ज़िंदगी को इज़्ज़त, ज़ब्त और हिम्मत के साथ जीना सीख लिया। तालीम और ख़्वाबों की परवाज़ (1965–1983) 1965 में उन्होंने इंसान स्कूल के बोर्डिंग हाउस में दाख़िला लिया और 1970 तक वहाँ तालीम हासिल की। इन सालों ने उनके शख़्सियत को तराशा — हॉस्टल का अनुशासन, दोस्ती के रिश्ते, और इल्म के प्रति गहरी दिलचस्पी। इसके बाद एक साल नेशनल हाई स्कूल (1970–71) में और फिर रसेल हाई स्कूल (1971–73) में आलिया सेकेंड्री तालीम पूरी की। 1974 में वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुँचे, जहाँ 1983 तक तालीम जारी रखी। एएमयू ने उन्हें सिर्फ़ डिग्री नहीं दी बल्कि सोचने का सलीक़ा, फ़िक्र का तौसीअ और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का जज़्बा भी दिय...